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वैकुण्ठ चतुर्दशी 2025: तिथि, पूजन-विधि और महत्व
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- कामिनी शर्मा@medgallant.com
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वैकुण्ठ चतुर्दशी 2025: तिथि, पूजन-विधि और महत्व
वैकुण्ठ चतुर्दशी एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिंदू पर्व है जो भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों को समर्पित है। यह पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। 2025 में वैकुण्ठ चतुर्दशी 16 नवम्बर, रविवार को मनाई जाएगी। यह दिन वाराणसी, महाराष्ट्र और अन्य कई स्थानों के मंदिरों में विशेष श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
वैकुण्ठ चतुर्दशी की पूजा-विधि और परंपराएँ
भगवान विष्णु की पूजा: भक्तजन भगवान विष्णु को 1000 कमल पुष्प अर्पित करते हैं।
भगवान शिव की पूजा: इस दिन शिवजी को बिल्वपत्र चढ़ाने की परंपरा है।
विशेष रात्रि जागरण: महाराष्ट्र और वाराणसी के मंदिरों में पूरी रात भजन-कीर्तन और विशेष आरती होती है।
व्रत और उपवास: श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं और भक्ति गीत गाकर भगवान विष्णु और शिव की संयुक्त आराधना करते हैं।
दीपदान और सजावट: मंदिरों और घाटों पर दीप प्रज्वलित किए जाते हैं और भक्तजन दीपदान करते हैं।
वैकुण्ठ चतुर्दशी का महत्व
वैकुण्ठ चतुर्दशी शैव और वैष्णव परंपराओं की एकता का प्रतीक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु एक साथ पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन की गई पूजा और भक्ति से पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यह पर्व यह संदेश देता है कि चाहे साधक भगवान शिव के उपासक हों या विष्णु भक्त, अंतिम उद्देश्य एक ही है — मोक्ष और ईश्वर की प्राप्ति।
वैकुण्ठ चतुर्दशी से जुड़ी पौराणिक कथा
कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु काशी (वाराणसी) आए और भगवान शिव से मिलने के लिए रात्रि भर भजन-कीर्तन किया। शिवजी विष्णु की भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें मोक्षदायी शक्ति प्रदान की। इसीलिए वाराणसी में वैकुण्ठ चतुर्दशी का विशेष महत्व माना जाता है।
निष्कर्ष
वैकुण्ठ चतुर्दशी 2025 केवल भगवान विष्णु और भगवान शिव की आराधना का ही पर्व नहीं है, बल्कि यह सौहार्द, एकता और मोक्ष का संदेश भी देता है। 16 नवम्बर को मनाया जाने वाला यह पावन पर्व भक्तों के जीवन में शांति, पुण्य और आशीर्वाद लाने वाला माना जाता है।