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देव उठनी एकादशी 2025: तिथि, व्रत विधि और महत्व
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- कामिनी शर्मा@medgallant.com
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देव उठनी एकादशी 2025: तिथि, व्रत विधि, कथा और महत्व
देव उठनी एकादशी 2025 की तिथि
देव उठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह तिथि प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जानी जाती है।
2025 में देव उठनी एकादशी 5 नवम्बर (बुधवार) को मनाई जाएगी।
इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा (चातुर्मास) से जागते हैं और पुनः सृष्टि के संचालन में सक्रिय होते हैं।
व्रत एवं पूजा विधि
व्रत पालन: भक्तजन प्रातःकाल स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं। यह व्रत निर्जला, फलाहार या जलाहार रूप से किया जा सकता है।
भगवान विष्णु की पूजा: विष्णु जी की मूर्ति या शालिग्राम को गंगाजल से स्नान कराकर, पीले वस्त्र पहनाए जाते हैं और तुलसी पत्र अर्पित किए जाते हैं।
तुलसी विवाह: इस दिन तुलसी माता और शालिग्राम (विष्णु स्वरूप) का विवाह संपन्न कराया जाता है। इसे धरती पर पहला विवाह भी माना जाता है, जिसके बाद वैवाहिक मांगलिक कार्य शुरू होते हैं।
मंदिर दर्शन और भजन-कीर्तन: भक्तजन विष्णु मंदिरों में जाकर सहस्रनाम पाठ, गीता पाठ और भजन-कीर्तन करते हैं।
शुभ कार्यों की शुरुआत: इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण संस्कार और धार्मिक अनुष्ठान जैसे कार्य पुनः आरंभ होते हैं।
देव उठनी एकादशी की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा बलि ने अपने तप और दान से तीनों लोकों पर अधिकार प्राप्त कर लिया था। देवताओं ने भगवान विष्णु से मदद मांगी। तब भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर बलि से भिक्षा मांगने पहुँचे।
वामन ने तीन पग भूमि मांगी। बलि ने वचन दे दिया। भगवान ने अपने विराट रूप से दो पग में पृथ्वी और आकाश नाप लिया। तीसरा पग रखने के लिए बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।
वचन के पक्के राजा बलि को भगवान विष्णु ने पाताल लोक का स्वामी बना दिया और उनके द्वार पर चार महीने तक विश्राम (चातुर्मास) करने का वचन दिया।देव उठनी एकादशी को भगवान विष्णु पुनः बैकुंठ लौटे और तभी से यह व्रत आरंभ हुआ।
महत्व
यह दिन भगवान विष्णु के जागरण का प्रतीक है।
विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और धार्मिक कार्यों की शुरुआत इसी दिन से की जाती है।
तुलसी विवाह करने से घर में सुख-शांति और वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है।
इस व्रत को करने से पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
देव उठनी एकादशी का समय ऋतु परिवर्तन का होता है।
यह दिन शरद ऋतु से शीत ऋतु की ओर बढ़ने का संकेत है।
व्रत रखने से शरीर की पाचन शक्ति मजबूत होती है और शरीर डिटॉक्स होता है।
तुलसी का धार्मिक महत्व तो है ही, साथ ही तुलसी का पौधा वातावरण को शुद्ध करता है और स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।
क्षेत्रीय महत्व
उत्तर भारत: विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में तुलसी विवाह का आयोजन बड़े धूमधाम से होता है।
गुजरात और महाराष्ट्र: मंदिरों में भजन-कीर्तन और मेला लगता है।
दक्षिण भारत: इसे देवोत्थान एकादशी कहा जाता है और भगवान विष्णु के विशेष मंदिरों में उत्सव होता है।
नेपाल: यहाँ इसे हरिहर विवाह उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
निष्कर्ष
देव उठनी एकादशी 2025 धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल भगवान विष्णु के जागरण का दिन नहीं बल्कि शुभ कार्यों की शुरुआत का प्रतीक भी है। इस दिन व्रत, तुलसी विवाह और विष्णु पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि, सौभाग्य और शांति का वास होता है।